PIB ने 28 अक्टूबर 2026 को भारत की नई अंतरिक्ष तकनीकों पर पृष्ठभूमि लेख जारी किया। इसमें अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यान, पुनःप्रयोग, प्रणोदन और अंतरिक्ष में डॉकिंग जैसी क्षमताओं की चर्चा है। ESTIC-2026 में अंतरिक्ष विज्ञान एवं तकनीक का सत्र 29 अक्टूबर को निर्धारित है; सुबह की इस रिपोर्ट में उसे संपन्न नहीं बताया जा रहा है।
मुख्य तथ्य एक नज़र में
| NGLV | Next Generation Launch Vehicle |
|---|---|
| विकास स्वीकृति | सितंबर 2024 |
| स्वीकृत लागत | ₹8,240 करोड़ |
| अधिकतम पेलोड डिजाइन लक्ष्य | निम्न पृथ्वी कक्षा में 30 टन |
NGLV क्या है?
NGLV अगली पीढ़ी का प्रक्षेपण यान है जिसका विकास भारत की भविष्य की अंतरिक्ष जरूरतों को ध्यान में रखकर स्वीकृत किया गया। मूल मंत्रिमंडल निर्णय के अनुसार इसमें पुनःप्रयोग योग्य पहला चरण और अधिक पेलोड क्षमता की परिकल्पना है। 30 टन अधिकतम डिजाइन क्षमता का लक्ष्य है; इसे अभी नियमित सेवा में उपलब्ध क्षमता नहीं कहना चाहिए।
स्वीकृत लागत में विकास, तीन विकासात्मक उड़ानें, जरूरी सुविधाएँ, कार्यक्रम प्रबंधन और प्रक्षेपण अभियान शामिल हैं। लागत को किसी एक उड़ान की टिकट या प्रति प्रक्षेपण कीमत समझना गलत होगा।
पुनःप्रयोग क्यों महत्वपूर्ण है?
सामान्य उदाहरण से समझें: यदि किसी महँगे उपकरण के उपयोग के बाद उसे सुरक्षित वापस लाकर फिर इस्तेमाल किया जा सके, तो निर्माण की जरूरत और परिचालन ढाँचा बदल सकता है। रॉकेट में ऐसा करना कठिन है क्योंकि वापसी, नियंत्रण, ताप और पुनःउड़ान की विश्वसनीयता पर काम करना पड़ता है।
पुनःप्रयोग का उद्देश्य अंतरिक्ष तक पहुँच की लागत घटाना है। लेकिन हर मिशन की क्षमता, ईंधन और उड़ान की योजना अलग हो सकती है। इसलिए अधिकतम पेलोड को हर उड़ान या हर विन्यास पर समान रूप से लागू न करें।
Static GK: प्रक्षेपण और डॉकिंग का अंतर
प्रक्षेपण यान उपग्रह या अंतरिक्ष यान को निर्धारित कक्षा तक पहुँचाता है। डॉकिंग में कक्षा में मौजूद दो अंतरिक्ष यानों को नियंत्रित तरीके से जोड़ा जाता है। यह केवल पास से गुजरने या एक-दूसरे की तस्वीर लेने से अलग प्रक्रिया है।
ISRO ने SpaDeX के दो उपग्रहों की पहली सफल डॉकिंग 16 जनवरी 2025 को की थी। दूसरी डॉकिंग 20 अप्रैल 2025 को हुई और अगले दिन दोनों दिशाओं में विद्युत हस्तांतरण का प्रदर्शन किया गया। ये स्थापित तकनीकी उपलब्धियाँ हैं; इन्हें अक्टूबर 2026 की नई घटना न समझें।
परीक्षा में तकनीक और लक्ष्य अलग रखें
LEO का अर्थ Low Earth Orbit यानी निम्न पृथ्वी कक्षा है। किसी रॉकेट की क्षमता बताते समय कक्षा का नाम जरूरी है। LEO की पेलोड क्षमता को सीधे दूसरी कक्षा की क्षमता के समान नहीं लिखा जा सकता।
पुनःप्रयोग, भारी पेलोड और डॉकिंग अलग तकनीकी समस्याओं के समाधान हैं। इन्हें जोड़कर पढ़ने से भविष्य के अंतरिक्ष स्टेशन और बहु-चरणीय अभियानों की आवश्यकताएँ समझ आती हैं। किसी योजना का अनुमोदन, परीक्षण और परिचालन शुरुआत तीन अलग अवस्थाएँ हैं।
परीक्षा उपयोगी बिंदु
- NGLV को विकासाधीन परियोजना के रूप में पढ़ें।
- SpaDeX: Space Docking Experiment।
- कक्षा, पेलोड और लागत का आधार स्पष्ट रखें।
आधिकारिक स्रोत
- PIB: भारत की नई अंतरिक्ष तकनीकें
- प्रधानमंत्री कार्यालय: NGLV विकास स्वीकृति
- ISRO: पहली SpaDeX डॉकिंग
- ISRO: दूसरी डॉकिंग और विद्युत हस्तांतरण