3 नवंबर 2026 की पर्यावरण मंत्रालय की सूचना के अनुसार भारतीय प्राणी सर्वेक्षण—ZSI के वैज्ञानिकों ने IUCN के पहले वैश्विक प्रवाल-भित्ति पारितंत्र आकलन में योगदान दिया है। यह अध्ययन समुद्र के बढ़ते तापमान और भविष्य के जोखिम को परखता है। मूल वैश्विक आकलन 22 अक्टूबर 2026 को प्रस्तुत हुआ था; नवंबर की सूचना भारत की वैज्ञानिक भूमिका पर केंद्रित है।

मुख्य तथ्य एक नज़र में

वैश्विक संस्था IUCN
आकलन व्यवस्था Red List of Ecosystems
भारतीय वैज्ञानिक संस्था ZSI
दक्षिण एशिया के अध्ययन क्षेत्र 13 इकोरीजन
भारत के प्रमुख क्षेत्र 4 इकोरीजन
मुख्य खतरा समुद्री तापीय तनाव और bleaching

नए आकलन का प्रमुख निष्कर्ष

  • IUCN के अनुसार भविष्य के समुद्री तापीय तनाव को शामिल करने पर विश्व के 96 प्रतिशत आकलित प्रवाल पारितंत्र Critically Endangered श्रेणी में हैं। दक्षिण एशिया के सभी 13 आकलित इकोरीजन भी इस उच्च जोखिम श्रेणी में आते हैं।
  • Critically Endangered का मतलब यह नहीं कि पूरा पारितंत्र पहले ही समाप्त हो चुका है। यह जोखिम की श्रेणी है। भविष्य के अनुमान और वर्तमान में देखी गई क्षति अलग आधार हैं; इन्हें मिलाकर “सभी प्रवाल नष्ट हो गए” लिखना गलत होगा।

भारत के चार प्रमुख प्रवाल क्षेत्र

  • भारतीय क्षेत्रों में अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप, दक्षिणी तट का मन्नार की खाड़ी–पाक खाड़ी क्षेत्र और पश्चिमी तट का कच्छ की खाड़ी क्षेत्र शामिल हैं। मानचित्र में द्वीपीय और मुख्य भूमि वाले क्षेत्रों को अलग पहचानना उपयोगी है।
  • ZSI ने क्षेत्रीय रिपोर्ट के लिए सर्वेक्षण, प्रजाति अध्ययन और निगरानी के आँकड़ों में योगदान दिया। मंत्रालय के अनुसार क्षेत्र में सूचीबद्ध 350 निगरानी स्थलों में 162 भारतीय क्षेत्रों से थे। यह तथ्य वैज्ञानिक निगरानी के महत्व को दर्शाता है।

Static GK: Coral bleaching क्या है?

  • NOAA के अनुसार तापमान, प्रकाश या पोषक दशाओं में तनाव के कारण प्रवाल अपने ऊतकों में रहने वाले सहजीवी शैवाल बाहर निकाल सकते हैं। इससे उनका सफेद कंकाल अधिक दिखाई देने लगता है; इस प्रक्रिया को प्रवाल विरंजन या coral bleaching कहते हैं।
  • विरंजन के बाद प्रवाल तुरंत मृत होना आवश्यक नहीं है। परिस्थितियाँ सुधरें तो वे बच सकते हैं, लेकिन लंबे तनाव में मृत्यु का जोखिम बढ़ता है। इसलिए सफेद दिख रहे प्रवाल और पूरी तरह मर चुके प्रवाल का अंतर समझना जरूरी है।

प्रजाति और पारितंत्र की Red List में अंतर

  • Red List of Threatened Species किसी प्रजाति के विलुप्त होने के जोखिम पर केंद्रित होती है। Red List of Ecosystems पूरे पारितंत्र की कार्यप्रणाली और विशेषताओं के खोने अर्थात collapse के जोखिम को देखती है।
  • एक प्रवाल प्रजाति का बचा रहना और पूरे रीफ का स्वस्थ रहना समान बात नहीं है। रीफ में जीवों, भौतिक वातावरण और पारिस्थितिक प्रक्रियाओं के संबंध होते हैं। इसी कारण इस अध्ययन को केवल एक जीव की सूची समझना अधूरा होगा।

संरक्षण और परीक्षा का व्यावहारिक दृष्टिकोण

  • इस खबर का उत्तर तीन स्तरों में तैयार करें—समुद्री तापीय तनाव का कारण, पारितंत्र पर प्रभाव और स्थानीय संरक्षण की भूमिका। स्वच्छ तटीय जल तथा संसाधनों के बेहतर प्रबंधन को जलवायु कार्रवाई के साथ पढ़ें। किसी एक उपाय को सभी समस्याओं का पूर्ण समाधान न कहें।
  • पुनरावृत्ति के लिए भारत के चार प्रवाल क्षेत्रों को खाली मानचित्र में चिह्नित करें और bleaching की दो पंक्तियों में व्याख्या लिखें। आँकड़े के साथ “आकलित” और “भविष्य के तापीय जोखिम सहित” जैसे शब्द लिखने से उसका अर्थ सही रहता है।

परीक्षा उपयोगी बिंदु

  • ZSI का विस्तार: Zoological Survey of India।
  • RLE का विषय: पारितंत्र के collapse का जोखिम।
  • Bleaching हमेशा तत्काल मृत्यु नहीं है।
  • भारत के प्रमुख प्रवाल क्षेत्रों को मानचित्र में पहचानें।

आधिकारिक स्रोत

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