प्रमुख वाद्ययंत्र एवं वादक

(Famous Musical Instruments & Instrumentalists)

भाग–1 : भारतीय संगीत का परिचय, इतिहास एवं वाद्ययंत्रों का वर्गीकरण

भारतीय संगीत का परिचय

भारत की सांस्कृतिक परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन एवं समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं में से एक है। इस संस्कृति के प्रमुख अंगों में संगीत (Music), नृत्य (Dance) तथा नाट्य (Drama) का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। भारतीय संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना, धार्मिक उपासना, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति तथा भावनात्मक संप्रेषण का माध्यम भी है।

भारतीय संगीत का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। इसका प्रारम्भ वैदिक काल से माना जाता है। वैदिक ऋषियों द्वारा यज्ञों एवं धार्मिक अनुष्ठानों में मंत्रों का जो सस्वर उच्चारण किया जाता था, वही आगे चलकर भारतीय संगीत की आधारशिला बना। सामवेद को भारतीय संगीत का मूल स्रोत माना जाता है, क्योंकि इसमें ऋग्वेद की ऋचाओं को विशेष स्वरबद्ध शैली में गाया गया है।

भारतीय संगीत का विकास समय के साथ अनेक रूपों में हुआ। विभिन्न राजवंशों, धार्मिक आंदोलनों, संत परंपराओं तथा विदेशी प्रभावों ने इसके स्वरूप को समृद्ध बनाया। आज भारतीय संगीत अपनी वैज्ञानिक संरचना, राग-ताल प्रणाली, स्वर-सिद्धांत तथा आध्यात्मिक गहराई के कारण विश्वभर में विशिष्ट स्थान रखता है।

संगीत का अर्थ एवं परिभाषा

'संगीत' शब्द संस्कृत के 'सम्' + 'गीत' से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है—सम्यक् अथवा सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया गीत। परंतु भारतीय परंपरा में संगीत केवल गायन तक सीमित नहीं है।

भारतीय संगीत शास्त्र के अनुसार—

"गीतम्, वाद्यम् तथा नृत्यम्—त्रयं संगीतमुच्यते।"

अर्थात्—

  • गीत (Vocal Music) – स्वर द्वारा गाया जाने वाला संगीत।
  • वाद्य (Instrumental Music) – वाद्ययंत्रों द्वारा प्रस्तुत संगीत।
  • नृत्य (Dance) – संगीत के साथ लयबद्ध शारीरिक अभिव्यक्ति।

इन्हीं तीनों का समन्वित रूप संगीत कहलाता है।

भारतीय संगीत की विशेषताएँ

भारतीय संगीत को विश्व के अन्य संगीत रूपों से अलग पहचान दिलाने वाली प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

1. राग प्रधान संगीत

भारतीय संगीत का आधार राग है। प्रत्येक राग का अपना निश्चित स्वरक्रम, समय, भाव तथा प्रस्तुति का विधान होता है।

2. ताल प्रणाली

भारतीय संगीत में लय एवं ताल का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक प्रस्तुति किसी न किसी ताल में होती है।

3. आध्यात्मिक स्वरूप

भारतीय संगीत का संबंध केवल मनोरंजन से नहीं बल्कि ईश्वर-भक्ति, ध्यान तथा आत्मिक शांति से भी माना जाता है।

4. वैज्ञानिक आधार

भारतीय संगीत सात स्वरों, श्रुतियों, कंपन (Vibration) तथा ध्वनि-विज्ञान पर आधारित है।

5. मौखिक परंपरा

प्राचीन काल में संगीत का ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होता था।

6. रचनात्मक स्वतंत्रता

भारतीय शास्त्रीय संगीत में कलाकार को राग के नियमों के भीतर रहकर आलाप, तान एवं विस्तार प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता होती है।

भारतीय संगीत का ऐतिहासिक विकास

भारतीय संगीत का विकास अनेक कालों में हुआ है।

1. वैदिक काल (1500 ईसा पूर्व – 600 ईसा पूर्व)

भारतीय संगीत का प्रारम्भ वैदिक युग से माना जाता है।

प्रमुख विशेषताएँ

  • सामवेद में संगीत का सर्वप्रथम व्यवस्थित वर्णन मिलता है।
  • यज्ञों में सामगान किया जाता था।
  • उदात्त, अनुदात्त एवं स्वरित तीन प्रकार के स्वरों का प्रयोग होता था।
  • संगीत मुख्यतः धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित था।
✔ परीक्षा तथ्य: सामवेद को भारतीय संगीत का मूल स्रोत कहा जाता है।

2. उत्तर वैदिक एवं महाकाव्य काल

इस काल में संगीत धार्मिक सीमाओं से बाहर निकलकर सामाजिक जीवन का भाग बनने लगा।

प्रमुख विशेषताएँ

  • रामायण एवं महाभारत में वीणा, मृदंग, दुन्दुभि, शंख आदि वाद्यों का उल्लेख मिलता है।
  • भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी भारतीय संगीत की सांस्कृतिक पहचान बनी।
  • संगीत का उपयोग राजदरबारों एवं उत्सवों में भी होने लगा।

3. मौर्य एवं गुप्त काल

गुप्त काल को भारतीय कला एवं संगीत का स्वर्णकाल माना जाता है।

प्रमुख विशेषताएँ

  • वीणा का व्यापक विकास।
  • मंदिर संगीत की परंपरा प्रारम्भ।
  • राजाश्रय प्राप्त कलाकारों की संख्या बढ़ी।
  • संगीत शिक्षा व्यवस्थित हुई।

4. प्रारम्भिक मध्यकाल

इस काल में संगीत का शास्त्रीय स्वरूप अधिक विकसित हुआ।

प्रमुख ग्रंथ

  • नाट्यशास्त्र
  • बृहद्देशी
  • संगीत रत्नाकर

इन्हीं ग्रंथों में राग, ताल तथा वाद्ययंत्रों का व्यवस्थित वर्णन मिलता है।

5. मध्यकाल (सल्तनत एवं मुगल काल)

मध्यकाल भारतीय संगीत के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्रमुख विशेषताएँ

  • हिन्दुस्तानी संगीत का विकास।
  • फारसी एवं भारतीय संगीत का समन्वय।
  • नए रागों का निर्माण।
  • अनेक नए वाद्यों का विकास।

अमीर खुसरो का योगदान

अमीर खुसरो को भारतीय संगीत का महान नवप्रवर्तक माना जाता है। परंपरागत रूप से उन्हें निम्नलिखित उपलब्धियों से जोड़ा जाता है—

  • कव्वाली शैली का विकास।
  • तराना शैली का विकास।
  • सितार एवं तबले के विकास से उनका नाम जुड़ा हुआ है, यद्यपि आधुनिक इतिहासकार इन वाद्यों के क्रमिक विकास को अधिक स्वीकार करते हैं।
  • भारतीय एवं फारसी संगीत का समन्वय।
✔ परीक्षा तथ्य: आधुनिक शोध के अनुसार, सितार और तबला किसी एक व्यक्ति द्वारा आविष्कृत नहीं माने जाते; इनका विकास कई शताब्दियों में क्रमिक रूप से हुआ।

6. भक्ति काल में संगीत

भक्ति आंदोलन ने भारतीय संगीत को जनसामान्य तक पहुँचाया।

प्रमुख संत

  • सूरदास
  • मीराबाई
  • तुलसीदास
  • कबीर
  • नामदेव
  • तुकाराम
  • चैतन्य महाप्रभु
  • त्यागराज (कर्नाटक संगीत)

इन संतों ने भजन, कीर्तन एवं संकीर्तन के माध्यम से संगीत को लोकजीवन से जोड़ा।

7. आधुनिक काल

स्वतंत्रता के बाद भारतीय संगीत को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।

प्रमुख विशेषताएँ

  • आकाशवाणी एवं दूरदर्शन द्वारा संगीत का प्रचार।
  • संगीत विश्वविद्यालयों की स्थापना।
  • अंतरराष्ट्रीय संगीत समारोह।
  • भारतीय कलाकारों को ग्रैमी, पद्म पुरस्कार एवं भारत रत्न जैसे सम्मान प्राप्त हुए।

प्रमुख आधुनिक कलाकार

  • पंडित रवि शंकर
  • उस्ताद बिस्मिल्लाह खान
  • उस्ताद अमजद अली खान
  • पंडित शिवकुमार शर्मा
  • पंडित हरिप्रसाद चौरसिया
  • उस्ताद जाकिर हुसैन
  • डॉ. एल. सुब्रमण्यम

भारतीय संगीत के प्रमुख ग्रंथ

भारतीय संगीत के सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप देने में अनेक प्राचीन ग्रंथों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

ग्रंथ लेखक प्रमुख योगदान
नाट्यशास्त्र भरतमुनि संगीत, नृत्य एवं नाट्य का प्रथम व्यवस्थित ग्रंथ; वाद्ययंत्रों का प्रारंभिक वर्गीकरण
दत्तिलम् दत्तिल जातियों एवं संगीत सिद्धांत का प्रारंभिक वर्णन
बृहद्देशी मतंग मुनि 'राग' शब्द का प्रथम व्यवस्थित उल्लेख; देशी संगीत की अवधारणा
संगीत मकरंद नारद स्वर, राग एवं संगीत सिद्धांत का विवेचन
संगीत रत्नाकर शारंगदेव उत्तर एवं दक्षिण भारतीय संगीत की साझा आधारशिला; राग, ताल एवं वाद्यों का विस्तृत वर्णन
स्वरमेल कलानिधि राममात्य कर्नाटक संगीत की स्वर व्यवस्था
चतुर्दण्डी प्रकाशिका वेंकटमखी मेलकर्ता प्रणाली का प्रतिपादन

भारतीय संगीत की दो प्रमुख परम्पराएँ

1. हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत

  • उत्तर भारत में विकसित।
  • फारसी एवं भारतीय संगीत का समन्वय।
  • प्रमुख गायन शैलियाँ—ध्रुपद, धमार, ख्याल, ठुमरी, टप्पा, तराना।
  • प्रमुख वाद्य—सितार, सरोद, तबला, सारंगी, बांसुरी, शहनाई, संतूर।

2. कर्नाटक शास्त्रीय संगीत

  • दक्षिण भारत में विकसित।
  • अपेक्षाकृत शुद्ध एवं पारंपरिक स्वरूप।
  • प्रमुख वाद्य—वीणा, मृदंगम, नादस्वरम्, घटम, कंजीरा, वायलिन।
  • प्रमुख संत-संगीतकार—त्यागराज, मुथुस्वामी दीक्षितर, श्याम शास्त्री।

भारतीय वाद्ययंत्रों का वर्गीकरण

भारतीय संगीतशास्त्र में वाद्ययंत्रों का वैज्ञानिक वर्गीकरण भरतमुनि द्वारा नाट्यशास्त्र में किया गया, जिसे आगे शारंगदेव ने संगीत रत्नाकर में विस्तार दिया। ध्वनि उत्पन्न करने की प्रक्रिया के आधार पर वाद्ययंत्र चार वर्गों में विभाजित किए जाते हैं।

1. तत वाद्य (String Instruments)

तारों के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है।

उदाहरण: सितार, सरोद, वीणा, संतूर, सारंगी, तानपुरा, इसराज, दिलरुबा, मोहन वीणा।

2. सुषिर वाद्य (Wind Instruments)

वायु के प्रवाह से ध्वनि उत्पन्न होती है।

उदाहरण: बांसुरी, शहनाई, नादस्वरम्, शंख, हारमोनियम।

3. अवनद्ध वाद्य (Membrane Instruments)

चमड़े की झिल्ली पर प्रहार से ध्वनि उत्पन्न होती है।

उदाहरण: तबला, पखावज, मृदंगम, ढोलक, ढोल, नगाड़ा।

4. घन वाद्य (Idiophones)

ठोस पदार्थ के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है।

उदाहरण: मंजीरा, झांझ, करताल, जलतरंग, घंटा।

📌 प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
  • सामवेद भारतीय संगीत का सबसे प्राचीन स्रोत माना जाता है।
  • भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में वाद्ययंत्रों का वर्गीकरण किया।
  • शारंगदेव की संगीत रत्नाकर भारतीय संगीत का प्रमुख शास्त्रीय ग्रंथ है।
  • मतंग मुनि ने बृहद्देशी में 'राग' का व्यवस्थित विवेचन किया।
  • भारतीय वाद्ययंत्रों को चार वर्गों—तत, सुषिर, अवनद्ध और घन—में विभाजित किया जाता है।
  • भारतीय शास्त्रीय संगीत की दो प्रमुख परम्पराएँ हैं—हिन्दुस्तानी और कर्नाटक।
  • गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय संगीत शिक्षा की मूल आधारशिला रही है।
  • संगीत के तीन अंग—गीत, वाद्य और नृत्य—मिलकर संगीत की पूर्ण अवधारणा बनाते हैं।
भाग–2 : तत वाद्य (String Instruments)

तत वाद्य (String Instruments)

परिचय

तत वाद्य वे वाद्ययंत्र हैं जिनमें तार (Strings) के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है। भारतीय संगीत में इनका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। रागों की प्रस्तुति, आलाप, तान, मींड तथा गमक जैसी सूक्ष्म संगीतात्मक अभिव्यक्तियाँ मुख्यतः इन्हीं वाद्ययंत्रों द्वारा प्रभावी रूप से प्रस्तुत की जाती हैं।

प्राचीन भारतीय संगीतशास्त्र में इन्हें 'तन्त्री वाद्य' भी कहा गया है। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में तथा शारंगदेव ने संगीत रत्नाकर में इनका विस्तृत वर्णन किया है।

तत वाद्यों की प्रमुख विशेषताएँ

  • तारों के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है।
  • लकड़ी, कद्दू (तुम्बा), धातु एवं तारों से निर्मित।
  • राग संगीत की प्रस्तुति के लिए सर्वाधिक उपयुक्त।
  • मींड (Meend), गमक (Gamak), मुरकी (Murki) एवं तान (Taan) की प्रस्तुति संभव।
  • हिन्दुस्तानी तथा कर्नाटक दोनों संगीत परंपराओं में समान रूप से महत्वपूर्ण।

प्रमुख तत वाद्य

  • सितार
  • सरोद
  • वीणा
  • संतूर
  • सारंगी
  • तानपुरा
  • रुद्र वीणा
  • विचित्र वीणा
  • इसराज
  • दिलरुबा
  • वायलिन
  • मोहन वीणा

1. सितार (Sitar)

परिचय

सितार भारत का सबसे प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय तत वाद्य है। यह हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का प्रमुख एकल वाद्य (Solo Instrument) माना जाता है। अपनी मधुर, गूंजदार तथा भावपूर्ण ध्वनि के कारण इसे विश्वभर में भारतीय संगीत का प्रतीक माना जाता है।

आज यदि किसी विदेशी से भारतीय शास्त्रीय संगीत की पहचान पूछी जाए, तो प्रायः पहला नाम सितार का ही आता है। इसका श्रेय मुख्य रूप से पंडित रवि शंकर एवं उस्ताद विलायत खान जैसे महान कलाकारों को जाता है।

नाम की उत्पत्ति

'सितार' शब्द के संबंध में दो प्रमुख मत प्रचलित हैं—

पहला मत (सर्वाधिक प्रचलित): फारसी भाषा के 'सेह-तार (Seh-Tar)' से, जिसका अर्थ है— सेह = तीन, तार = तार (String), अर्थात् "तीन तार वाला वाद्य"। हालाँकि आधुनिक सितार में 18 से 21 तक तार होते हैं।

दूसरा मत: कुछ भारतीय विद्वानों के अनुसार सितार का विकास प्राचीन भारतीय वीणा से हुआ है तथा इसका नाम भारतीय परंपरा से संबंधित माना जाता है।

इतिहास

सितार के विकास के संबंध में कई मत हैं।

पारंपरिक मत: लोकप्रिय मान्यता के अनुसार अमीर खुसरो ने सितार का निर्माण किया।

आधुनिक ऐतिहासिक मत: आधुनिक संगीत इतिहासकारों के अनुसार—

  • सितार किसी एक व्यक्ति का आविष्कार नहीं है।
  • इसका वर्तमान स्वरूप 17वीं–18वीं शताब्दी में विकसित हुआ।
  • यह भारतीय वीणा एवं मध्य एशियाई तंत्री वाद्यों के क्रमिक विकास का परिणाम है।
✔ परीक्षा तथ्य: UPSC और अन्य आधुनिक परीक्षाओं में यही मत अधिक स्वीकार्य माना जाता है।

संरचना (Structure of Sitar)

सितार अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से निर्मित वाद्य है।

(1) तुम्बा (Resonator): सूखे कद्दू से बनाया जाता है। ध्वनि को गूंज प्रदान करता है। कुछ सितारों में दो तुम्बे होते हैं।

(2) दण्ड (Neck): सागौन अथवा तून की लकड़ी का। लगभग 3–4 फीट लंबा।

(3) पर्दे (Frets): धातु के बने। चलायमान (Movable) होते हैं। राग के अनुसार बदले जा सकते हैं।

(4) मुख्य तार: सामान्यतः 6 या 7 मुख्य तार। इनसे मुख्य धुन बजाई जाती है।

(5) तरब के तार (Sympathetic Strings): लगभग 11–13 तार। सीधे नहीं बजाए जाते। मुख्य तारों के कंपन से स्वयं गूंजते हैं। यही सितार की मधुर अनुनाद (Resonance) का मुख्य कारण है।

सितार बजाने की विधि

  • दाहिने हाथ की तर्जनी में मिजराब पहनकर तारों को झंकृत किया जाता है।
  • बायाँ हाथ तारों को दबाकर स्वर उत्पन्न करता है।
  • मींड निकालना सितार की सबसे बड़ी विशेषता है।

प्रमुख तकनीकें

  • मींड (Meend) – एक स्वर से दूसरे स्वर तक बिना टूटे हुए जाना।
  • गमक (Gamak) – स्वरों का कंपन।
  • मुरकी – अत्यंत तीव्र गति से स्वर परिवर्तन।
  • झाला – अत्यंत तेज गति से अंतिम भाग का वादन।

सितार के प्रमुख घराने

1. मैहर घराना — संस्थापक: उस्ताद अलाउद्दीन खान। विशेषताएँ: गहन रागदारी, विस्तृत आलाप, गंभीर शैली।

2. इटावा घराना — विशेषता: गायकी अंग, अत्यंत मधुर प्रस्तुति।

3. सेनिया घराना — तानसेन की परंपरा से संबंधित माना जाता है।

विश्व प्रसिद्ध सितार वादक

(1) पंडित रवि शंकर (1920–2012)

परिचय: भारतीय संगीत को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित करने वाले महानतम कलाकार।

जन्म: 7 अप्रैल 1920, वाराणसी। गुरु: उस्ताद अलाउद्दीन खान (मैहर घराना)।

प्रमुख उपलब्धियाँ:

  • भारत रत्न (1999)
  • पद्म विभूषण
  • पद्म भूषण
  • पद्मश्री
  • तीन ग्रैमी पुरस्कार
  • विश्वभर में भारतीय संगीत का प्रचार

विशेष योगदान:

  • जॉर्ज हैरिसन (The Beatles) के साथ कार्य।
  • मॉन्टेरी पॉप फेस्टिवल।
  • वुडस्टॉक फेस्टिवल।
  • Concert for Bangladesh (1971)
✔ परीक्षा तथ्य: भारत रत्न प्राप्त करने वाले महान सितार वादक।

(2) उस्ताद विलायत खान

घराना: इटावा घराना। विशेषता: गायकी अंग शैली के प्रवर्तक। इनकी शैली में ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई गायक गा रहा हो।

सम्मान: पद्मश्री, पद्मभूषण एवं पद्मविभूषण की पेशकश हुई, किंतु उन्होंने स्वीकार नहीं किया।

(3) पंडित निखिल बनर्जी

गुरु: उस्ताद अलाउद्दीन खान। विशेषता: अत्यंत गम्भीर राग प्रस्तुति। विश्व के श्रेष्ठ सितारवादकों में गिने जाते हैं।

(4) शाहिद परवेज

घराना: इटावा घराना। विशेषता: आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ सितारवादकों में गिने जाते हैं।

(5) बुद्धादित्य मुखर्जी

आधुनिक भारत के प्रमुख सितार वादक।

📌 प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
  • सितार हिन्दुस्तानी संगीत का प्रमुख तत वाद्य है।
  • इसे मिजराब से बजाया जाता है।
  • सामान्यतः 18–21 तार होते हैं।
  • 11–13 तरब के तार होते हैं।
  • भारत रत्न प्राप्त सितार वादक—पंडित रवि शंकर।
  • गायकी अंग शैली—उस्ताद विलायत खान।
  • मैहर घराना—उस्ताद अलाउद्दीन खान।

2. सरोद (Sarod)

परिचय

सरोद हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण तत वाद्य है। इसकी ध्वनि गंभीर, गहरी एवं प्रभावशाली होती है। इसे भारतीय संगीत के सबसे कठिन वाद्ययंत्रों में से एक माना जाता है क्योंकि इसमें फ्रेट (Frets) नहीं होते।

सरोद का स्वर अत्यंत स्पष्ट, गंभीर तथा ध्यानपूर्ण वातावरण उत्पन्न करता है। रागों की गंभीर प्रस्तुति के लिए इसे विशेष रूप से उपयुक्त माना जाता है।

नाम की उत्पत्ति

"सरोद" शब्द फारसी भाषा के 'सरूद' से बना माना जाता है, जिसका अर्थ है— संगीत अथवा मधुर धुन।

इतिहास

आधुनिक सरोद का विकास अफगानी रबाब से माना जाता है। 18वीं–19वीं शताब्दी में भारतीय संगीतकारों ने रबाब में कई परिवर्तन किए—

  • धातु का फिंगरबोर्ड जोड़ा।
  • तारों की संख्या बढ़ाई।
  • अनुनाद (Resonance) बेहतर किया।
  • रागदारी संगीत के अनुकूल बनाया।

संरचना

  • लकड़ी का शरीर
  • धातु का फिंगरबोर्ड
  • चमड़े से ढका अनुनादक
  • 17–25 तार (प्रकार के अनुसार)
  • मुख्य तार, ज्वारी तार एवं तरब के तार

सरोद की विशेषताएँ

  • इसमें फ्रेट नहीं होते।
  • नाखूनों के किनारे से तार दबाए जाते हैं।
  • जवा (Plectrum) से बजाया जाता है।
  • गहरी एवं गंभीर ध्वनि इसकी पहचान है।

सरोद के प्रमुख घराने

  • सेनिया बंगश घराना
  • मैहर घराना
  • शाहजहाँपुर घराना

प्रमुख सरोद वादक

उस्ताद अमजद अली खान — जन्म: 1945; सेनिया बंगश घराना; पद्म विभूषण; विश्व के सर्वश्रेष्ठ सरोद वादकों में से एक; रागों को सरल शैली में प्रस्तुत करने के लिए प्रसिद्ध।

उस्ताद अली अकबर खान — गुरु: उस्ताद अलाउद्दीन खान; मैहर घराना; अमेरिका में Ali Akbar College of Music की स्थापना; भारतीय संगीत के वैश्विक प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान।

पंडित बुद्धदेव दासगुप्ता — प्रसिद्ध सरोद वादक; राग संगीत के विद्वान; अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त।

✔ परीक्षा तथ्य: सरोद में फ्रेट नहीं होते। इसका विकास अफगानी रबाब से माना जाता है। उस्ताद अमजद अली खान सरोद के सर्वाधिक प्रसिद्ध वादक हैं। उस्ताद अली अकबर खान ने पश्चिमी देशों में भारतीय संगीत को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

3. वीणा (Veena)

परिचय

वीणा भारतीय संगीत का सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रतिष्ठित तत वाद्य है। इसे भारतीय संस्कृति में ज्ञान, कला एवं विद्या का प्रतीक माना जाता है। हिन्दू धर्म में देवी सरस्वती को वीणा धारण किए हुए दर्शाया जाता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में वीणा को अत्यंत सम्मान प्राप्त था।

ऋग्वेद, सामवेद, महाभारत, रामायण, नाट्यशास्त्र तथा संगीत रत्नाकर जैसे ग्रंथों में वीणा का उल्लेख मिलता है। इसे भारतीय संगीत का "आदर्श तंत्री वाद्य" भी कहा जाता है।

वीणा का इतिहास

वीणा का उल्लेख वैदिक साहित्य में मिलता है। प्रारम्भ में यह सरल संरचना वाला वाद्य था, परन्तु समय के साथ इसमें अनेक परिवर्तन हुए।

  • वैदिक काल – प्रारम्भिक वीणा का प्रयोग।
  • गुप्त काल – वीणा का व्यापक विकास।
  • मध्यकाल – विभिन्न प्रकार की वीणाओं का निर्माण।
  • आधुनिक काल – कर्नाटक संगीत में सरस्वती वीणा का व्यापक उपयोग।

वीणा का विकास भारतीय संगीत के साथ-साथ होता रहा और आज भी यह दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत का प्रमुख वाद्य है।

वीणा की संरचना

वीणा सामान्यतः लकड़ी से निर्मित होती है। इसमें एक बड़ा अनुनादक (Resonator), लंबा दण्ड, धातु के पर्दे (Frets), मुख्य तार तथा सहायक तार होते हैं।

प्रमुख भाग:

  • कुम्भ (गूंज पेटी)
  • दण्ड (Neck)
  • पर्दे (Frets)
  • मुख्य तार
  • सहायक तार
  • ब्रिज (घोड़ी)

वीणा की विशेषताएँ

  • अत्यंत मधुर एवं गंभीर ध्वनि।
  • गमक एवं मींड की उत्कृष्ट प्रस्तुति।
  • कर्नाटक संगीत का प्रमुख एकल वाद्य।
  • रागों की विस्तृत प्रस्तुति के लिए सर्वश्रेष्ठ।

वीणा के प्रमुख प्रकार

भारतीय संगीत में अनेक प्रकार की वीणाएँ प्रचलित रही हैं।

(1) सरस्वती वीणा — यह दक्षिण भारत में सबसे अधिक प्रचलित वीणा है।

विशेषताएँ: कर्नाटक संगीत का प्रमुख वाद्य; 24 पर्दे; 7 तार; लकड़ी से निर्मित।

प्रमुख कलाकार: एस. बालचंदर, ई. गायत्री, जयंती कुमारेश, आर. के. श्रीकांतन (वादन परंपरा से संबद्ध)।

(2) रुद्र वीणा — यह ध्रुपद संगीत का प्रमुख वाद्य है।

विशेषताएँ: दो बड़े तुम्बे; अत्यंत गंभीर ध्वनि; धीमी एवं गहन राग प्रस्तुति।

प्रमुख कलाकार: उस्ताद असद अली खान, उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर।

(3) विचित्र वीणा

विशेषताएँ: इसमें पर्दे (Frets) नहीं होते; स्लाइड (गोटा) की सहायता से बजाई जाती है; अत्यंत मधुर ध्वनि।

प्रमुख कलाकार: पंडित गोपाल कृष्ण, लालमणि मिश्र।

(4) चित्र वीणा (Chitra Veena) — दक्षिण भारत में प्रचलित आधुनिक वीणा।

प्रमुख कलाकार: एन. रविकिरण।

वीणा के प्रमुख वादक

एस. बालचंदर — महान कर्नाटक संगीतज्ञ; वीणा वादन की नवीन शैली विकसित की; अनेक अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुतियाँ।

ई. गायत्री — भारत की प्रसिद्ध महिला वीणा वादक। सम्मान: पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार।

जयंती कुमारेश — आधुनिक भारत की प्रसिद्ध वीणा वादक।

उस्ताद असद अली खान — भारत के अंतिम महान रुद्र वीणा वादकों में गिने जाते हैं। सम्मान: पद्म भूषण।

उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर — ध्रुपद संगीत के महान कलाकार एवं रुद्र वीणा वादक।

✔ परीक्षा तथ्य: देवी सरस्वती का वाद्य – वीणा। कर्नाटक संगीत का प्रमुख तंत्री वाद्य – सरस्वती वीणा। ध्रुपद शैली का प्रमुख तंत्री वाद्य – रुद्र वीणा। रुद्र वीणा के प्रसिद्ध कलाकार – असद अली खान।

4. संतूर (Santoor)

परिचय

संतूर भारत का अत्यंत मधुर एवं विशिष्ट तत वाद्य है। इसका उद्गम कश्मीर में माना जाता है। प्रारम्भ में यह लोक संगीत का वाद्य था, परन्तु बाद में इसे हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त हुआ।

संतूर को शास्त्रीय संगीत में स्थापित करने का सर्वाधिक श्रेय पंडित शिवकुमार शर्मा को दिया जाता है।

इतिहास

संतूर का संबंध प्राचीन फ़ारसी एवं मध्य एशियाई वाद्यों से भी जोड़ा जाता है, परन्तु भारतीय संतूर का स्वतंत्र विकास कश्मीर में हुआ।

  • कश्मीरी सूफी संगीत में इसका व्यापक प्रयोग होता था।
  • 20वीं शताब्दी में इसे शास्त्रीय संगीत में स्थापित किया गया।

संरचना

संतूर एक समलम्बाकार (Trapezoid) लकड़ी का वाद्य है। इसमें सामान्यतः—

  • लगभग 100 तार
  • 25–30 ब्रिज
  • दो लकड़ी की छोटी छड़ियाँ (कलम) से वादन

विशेषताएँ

  • अत्यंत मधुर एवं झंकारयुक्त ध्वनि।
  • एक साथ अनेक तार कंपन करते हैं।
  • रागों की प्रस्तुति अत्यंत आकर्षक होती है।

प्रमुख कलाकार

पंडित शिवकुमार शर्मा — जन्म: 1938। योगदान: संतूर को हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में स्थापित किया; अनेक नए रागों की प्रस्तुति; विश्वभर में संतूर को लोकप्रिय बनाया। सम्मान: पद्मश्री, पद्म विभूषण।

राहुल शर्मा — पंडित शिवकुमार शर्मा के पुत्र; आधुनिक संतूर वादक; भारतीय एवं पाश्चात्य संगीत का समन्वय।

✔ परीक्षा तथ्य: संतूर का संबंध कश्मीर से है। लगभग 100 तार होते हैं। दो लकड़ी की कलमों से बजाया जाता है। संतूर को शास्त्रीय संगीत में प्रतिष्ठा दिलाने का श्रेय – पंडित शिवकुमार शर्मा।

5. सारंगी (Sarangi)

परिचय

सारंगी भारतीय संगीत का अत्यंत प्राचीन एवं भावपूर्ण तंत्री वाद्य है। इसे मानव स्वर के सबसे निकट ध्वनि उत्पन्न करने वाला वाद्य माना जाता है।

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में यह मुख्यतः गायकों की संगत (Accompaniment) के लिए प्रयुक्त होता था, किन्तु बाद में इसे एकल वादन में भी प्रतिष्ठा मिली।

नाम की उत्पत्ति

'सारंगी' शब्द के विषय में दो मत प्रचलित हैं— 'सौ रंग' अर्थात अनेक रंगों वाली ध्वनि; अथवा 'सारंग' शब्द से व्युत्पन्न।

संरचना

  • एक ही लकड़ी के टुकड़े से निर्मित।
  • लगभग 35–40 तार।
  • मुख्य तार, सहायक तार एवं तरब के तार।
  • घोड़े के बालों वाले धनुष (Bow) से बजाई जाती है।

विशेषताएँ

  • मानव स्वर के सर्वाधिक निकट ध्वनि।
  • गमक एवं मींड की उत्कृष्ट प्रस्तुति।
  • ख्याल, ठुमरी एवं लोक संगीत में व्यापक उपयोग।

प्रमुख कलाकार

पंडित राम नारायण — योगदान: सारंगी को एकल वाद्य के रूप में स्थापित किया। सम्मान: पद्म विभूषण।

उस्ताद सुल्तान खान — विश्व प्रसिद्ध सारंगी वादक।

साबरी खान — राजस्थान के प्रसिद्ध सारंगी वादक।

कमाल साबरी — आधुनिक पीढ़ी के प्रमुख सारंगी कलाकार।

✔ परीक्षा तथ्य: मानव स्वर के सबसे निकट ध्वनि – सारंगी। धनुष (Bow) से बजाई जाती है। एकल सारंगी वादन के प्रवर्तक – पंडित राम नारायण।

6. तानपुरा (Tanpura / Tambura)

परिचय

तानपुरा भारतीय शास्त्रीय संगीत का ऐसा वाद्य है जो स्वयं राग नहीं बजाता, बल्कि पूरे गायन या वादन के दौरान निरंतर आधार स्वर (Drone) प्रदान करता है। यह किसी भी शास्त्रीय प्रस्तुति का अनिवार्य अंग है।

इतिहास

तानपुरा का विकास प्राचीन तंत्री वाद्यों से हुआ। यह सदियों से हिन्दुस्तानी तथा कर्नाटक दोनों संगीत परंपराओं में प्रयुक्त होता रहा है।

संरचना

  • बड़ा कद्दू या लकड़ी का अनुनादक।
  • लंबा दण्ड।
  • सामान्यतः 4 या 5 तार।
  • पर्दे (Frets) नहीं होते।

विशेषताएँ

  • केवल आधार स्वर (सा, प या म) देता है।
  • राग का वातावरण निर्मित करता है।
  • गायक एवं वादक दोनों के लिए स्वर-संदर्भ (Pitch Reference) प्रदान करता है।

प्रयोग

  • हिन्दुस्तानी संगीत
  • कर्नाटक संगीत
  • ध्रुपद
  • ख्याल
  • भजन
  • शास्त्रीय वादन

आजकल पारंपरिक तानपुरा के साथ इलेक्ट्रॉनिक तानपुरा और डिजिटल तानपुरा ऐप का भी व्यापक उपयोग किया जाता है।

वाद्य प्रमुख तथ्य
वीणा देवी सरस्वती का वाद्य; कर्नाटक संगीत का प्रमुख तंत्री वाद्य
रुद्र वीणा ध्रुपद शैली का प्रमुख वाद्य
संतूर कश्मीर का प्रसिद्ध तंत्री वाद्य; लगभग 100 तार
सारंगी मानव स्वर के सबसे निकट ध्वनि
तानपुरा आधार स्वर (Drone) प्रदान करने वाला वाद्य; 4–5 तार
भाग–3 : सुषिर वाद्य (Wind Instruments / वायु वाद्य)

सुषिर वाद्य (Wind Instruments)

परिचय

सुषिर वाद्य वे वाद्ययंत्र हैं जिनमें वायु (Air Column) के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है। "सुषिर" शब्द संस्कृत के 'सु' + 'शिर' से बना है, जिसका अर्थ है छिद्रयुक्त (Hollow)। इन वाद्यों में फूँक मारने पर भीतर स्थित वायु स्तम्भ (Air Column) कंपन करता है, जिससे स्वर उत्पन्न होता है।

भारतीय संगीत में सुषिर वाद्यों का उपयोग वैदिक काल से होता आया है। ऋग्वेद, सामवेद, महाभारत, रामायण, नाट्यशास्त्र आदि ग्रंथों में शंख, वेणु (बांसुरी), तुरही एवं अन्य वायु वाद्यों का उल्लेख मिलता है। उत्तर भारत की हिन्दुस्तानी संगीत परंपरा तथा दक्षिण भारत की कर्नाटक संगीत परंपरा—दोनों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है।

सुषिर वाद्यों की प्रमुख विशेषताएँ

  • वायु के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है।
  • अधिकांश वाद्य लकड़ी, बाँस, धातु या मिश्रित पदार्थों से निर्मित होते हैं।
  • इनका स्वर मधुर, स्पष्ट एवं दूर तक सुनाई देता है।
  • शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ लोक संगीत, धार्मिक अनुष्ठानों तथा सैन्य परंपराओं में भी इनका व्यापक उपयोग होता है।
  • श्वास-नियंत्रण (Breath Control) एवं अंगुलियों की गति (Finger Technique) इन वाद्यों के वादन की मूल आधारशिला है।

सुषिर वाद्यों का वर्गीकरण

प्रकार उदाहरण
प्राकृतिक सुषिर वाद्य बांसुरी, शंख
रीड (Reed) युक्त वाद्य शहनाई, नादस्वरम्
फ्री-रीड वाद्य हारमोनियम
धातु के वायु वाद्य तुरही, बिगुल

1. बांसुरी (Flute / वेणु)

परिचय

बांसुरी भारतीय संगीत का सबसे प्राचीन एवं लोकप्रिय सुषिर वाद्य है। इसे संस्कृत में वेणु, वंशी, मुरली आदि नामों से जाना जाता है। भारतीय संस्कृति में बांसुरी का विशेष धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व है क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण को सदैव बांसुरी के साथ चित्रित किया जाता है।

यह एक ऐसा वाद्य है जिसकी ध्वनि को प्राकृतिक, मधुर एवं आध्यात्मिक माना जाता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, फिल्म संगीत तथा भक्ति संगीत—सभी में इसका व्यापक उपयोग होता है।

बांसुरी का इतिहास

बांसुरी विश्व के सबसे प्राचीन वाद्ययंत्रों में से एक मानी जाती है। भारत में इसका उल्लेख वैदिक साहित्य, पुराणों, बौद्ध एवं जैन ग्रंथों तथा प्राचीन मूर्तियों में मिलता है।

  • ऋग्वेद में वेणु का उल्लेख।
  • महाभारत एवं भागवत पुराण में श्रीकृष्ण की मुरली का वर्णन।
  • भरहुत, साँची, अमरावती आदि स्तूपों की मूर्तियों में बांसुरी वादन के दृश्य।
  • अजंता एवं एलोरा की गुफाओं में भी बांसुरी बजाते कलाकारों का चित्रण मिलता है।

बांसुरी की संरचना

पारंपरिक भारतीय बांसुरी बाँस से बनाई जाती है, हालांकि आधुनिक समय में लकड़ी, धातु, पीवीसी तथा फाइबर से बनी बांसुरियाँ भी उपलब्ध हैं।

प्रमुख भाग:

  • मुख छिद्र (Blow Hole)
  • स्वर छिद्र (Finger Holes)
  • बाँस का खोखला शरीर
  • खुला निचला सिरा

स्वर छिद्र

सामान्यतः— 6 छिद्र वाली बांसुरी, 7 छिद्र वाली बांसुरी, 8 छिद्र वाली आधुनिक कॉन्सर्ट बांसुरी। भारतीय शास्त्रीय संगीत में 7 एवं 8 छिद्र वाली बांसुरियाँ अधिक प्रचलित हैं।

बांसुरी का वैज्ञानिक सिद्धांत

जब वादक मुख छिद्र पर वायु प्रवाहित करता है तो बांसुरी के भीतर स्थित वायु स्तम्भ कंपन करने लगता है। अंगुलियों से विभिन्न छिद्रों को खोलने एवं बंद करने पर वायु स्तम्भ की लंबाई बदलती है, जिससे अलग-अलग स्वर उत्पन्न होते हैं।

बांसुरी के प्रकार

  • (1) वेणु – दक्षिण भारत में प्रयुक्त।
  • (2) मुरली – भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित छोटी बांसुरी।
  • (3) बास बांसुरी – गंभीर एवं मंद्र स्वर वाली लंबी बांसुरी।
  • (4) कॉन्सर्ट बांसुरी – शास्त्रीय प्रस्तुतियों में प्रयुक्त।

हिन्दुस्तानी संगीत में बांसुरी

20वीं शताब्दी से पहले बांसुरी मुख्यतः लोक वाद्य मानी जाती थी। पंडित पन्नालाल घोष ने बड़ी बांसुरी का विकास कर इसे शास्त्रीय संगीत में प्रतिष्ठित किया। बाद में पंडित हरिप्रसाद चौरसिया ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध बनाया।

प्रमुख बांसुरी वादक

(1) पंडित पन्नालाल घोष (1911–1960) — योगदान: आधुनिक लंबी (बास) बांसुरी का विकास; बांसुरी को हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में स्थापित किया; शास्त्रीय रागों की प्रस्तुति के लिए उपयुक्त स्वरूप प्रदान किया।

(2) पंडित हरिप्रसाद चौरसिया — परिचय: भारतीय बांसुरी वादन के सबसे प्रसिद्ध कलाकारों में से एक। जन्म: 1 जुलाई 1938, इलाहाबाद (प्रयागराज)। गुरु: पंडित भोलानाथ प्रसन्न, अन्नपूर्णा देवी (मैहर घराना)।

प्रमुख उपलब्धियाँ:

  • पद्म भूषण
  • पद्म विभूषण
  • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
  • फ्रांस का Ordre des Arts et des Lettres
  • अनेक अंतरराष्ट्रीय सम्मान

विशेष योगदान:

  • भारतीय बांसुरी को विश्व स्तर पर लोकप्रिय बनाया।
  • अनेक फिल्मों के लिए संगीत निर्देशन (शिव-हरि जोड़ी में पंडित शिवकुमार शर्मा के साथ)।
  • यूरोप, अमेरिका एवं जापान में भारतीय संगीत का प्रचार।

(3) रोनू मजूमदार — आधुनिक शैली के प्रसिद्ध बांसुरी वादक; भारतीय एवं पाश्चात्य संगीत का समन्वय।

(4) एन. रामानी — कर्नाटक संगीत के महान बांसुरी वादक; दक्षिण भारत में वेणु वादन के प्रमुख कलाकार।

बांसुरी से जुड़े प्रमुख तथ्य

  • भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय वाद्य।
  • सबसे प्राचीन सुषिर वाद्यों में से एक।
  • बाँस से निर्मित।
  • भारतीय एवं पाश्चात्य दोनों संगीत में लोकप्रिय।
✔ परीक्षा तथ्य: बांसुरी का संस्कृत नाम — वेणु। आधुनिक शास्त्रीय बांसुरी के जनक — पंडित पन्नालाल घोष। विश्व प्रसिद्ध बांसुरी वादक — पंडित हरिप्रसाद चौरसिया। भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय वाद्य — बांसुरी।

2. शहनाई (Shehnai)

परिचय

शहनाई भारत का अत्यंत लोकप्रिय सुषिर वाद्य है। इसका उपयोग विशेष रूप से विवाह, मंदिरों, धार्मिक अनुष्ठानों एवं शुभ अवसरों पर किया जाता है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में इसे एक प्रतिष्ठित स्थान दिलाने का श्रेय भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को जाता है।

शहनाई का इतिहास

"शहनाई" शब्द की उत्पत्ति के संबंध में दो प्रमुख मत प्रचलित हैं—

  • 'शाह' + 'नाई' — अर्थात् राजदरबार में नाई समुदाय द्वारा बजाया जाने वाला वाद्य।
  • फारसी शब्दों से विकसित नाम।

मुगल काल में यह राजदरबारों एवं धार्मिक समारोहों का प्रमुख वाद्य बन गया।

संरचना

  • लकड़ी का लंबा शंक्वाकार शरीर।
  • ऊपर 6–9 स्वर छिद्र।
  • शीर्ष पर दोहरी रीड (Double Reed)।
  • निचले भाग में धातु की घंटी (Bell)।

विशेषताएँ

  • मधुर, गूंजदार एवं शुभ ध्वनि।
  • रागों की प्रस्तुति में सक्षम।
  • धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों में विशेष महत्व।

प्रमुख शहनाई वादक

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान (1916–2006) — परिचय: भारत के महानतम शहनाई वादक। जन्म: डुमराँव, बिहार। कार्यक्षेत्र: वाराणसी।

प्रमुख उपलब्धियाँ:

  • भारत रत्न (2001)
  • पद्म विभूषण
  • पद्म भूषण
  • पद्मश्री
  • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार

ऐतिहासिक उपलब्धि: 15 अगस्त 1947 को लालकिले से स्वतंत्र भारत के प्रथम समारोह में शहनाई वादन।

योगदान: शहनाई को लोक एवं विवाह समारोहों से निकालकर शास्त्रीय संगीत के मंच पर स्थापित किया; विश्व के अनेक देशों में भारतीय संगीत का प्रचार।

अली अहमद हुसैन खान — प्रसिद्ध शहनाई वादक; कोलकाता घराने से संबंधित; शास्त्रीय एवं अर्धशास्त्रीय संगीत में महत्वपूर्ण योगदान।

✔ परीक्षा तथ्य: शहनाई एक दोहरी रीड (Double Reed) वाला सुषिर वाद्य है। भारत रत्न प्राप्त शहनाई वादक — उस्ताद बिस्मिल्लाह खान। स्वतंत्र भारत के प्रथम स्वतंत्रता दिवस समारोह (15 अगस्त 1947) में लालकिले पर शहनाई वादन — उस्ताद बिस्मिल्लाह खान।

3. नादस्वरम् (Nadaswaram)

परिचय

नादस्वरम् (Nadaswaram / Nadhaswaram) दक्षिण भारत का अत्यंत प्राचीन, शक्तिशाली एवं प्रतिष्ठित सुषिर वाद्य है। इसे कर्नाटक शास्त्रीय संगीत का सबसे महत्वपूर्ण वायु वाद्य माना जाता है। इसकी ध्वनि अत्यंत तीव्र, गंभीर तथा दूर तक सुनाई देने वाली होती है, इसलिए इसे प्रायः "मंगल वाद्य" (Auspicious Instrument) भी कहा जाता है।

दक्षिण भारत के मंदिरों, धार्मिक यात्राओं, विवाह समारोहों तथा उत्सवों में नादस्वरम् का विशेष स्थान है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक एवं केरल की सांस्कृतिक परंपरा में इसका अत्यधिक महत्व है।

इतिहास

नादस्वरम् का इतिहास लगभग 1000 वर्ष पुराना माना जाता है। चोल, पाण्ड्य एवं विजयनगर साम्राज्य के समय मंदिर संगीत के साथ इसका व्यापक विकास हुआ। दक्षिण भारतीय मंदिरों में प्रातःकालीन एवं सायंकालीन पूजा के समय नादस्वरम् एवं तविल (Tavil) का संयुक्त वादन आज भी परंपरा का अंग है।

नाम की उत्पत्ति

"नाद" का अर्थ है ध्वनि, तथा "स्वरम्" का अर्थ है संगीतमय स्वर। इस प्रकार नादस्वरम् का शाब्दिक अर्थ है— "मधुर एवं गूंजपूर्ण स्वर उत्पन्न करने वाला वाद्य।"

संरचना

नादस्वरम् लकड़ी से निर्मित एक लंबा शंक्वाकार (Conical Bore) वाद्य है।

प्रमुख भाग:

  • लकड़ी का लंबा शरीर
  • दोहरी रीड (Double Reed)
  • सात मुख्य स्वर छिद्र
  • पाँच सहायक छिद्र
  • धातु की घंटी (Bell)

विशेषताएँ

  • अत्यंत ऊँची एवं प्रभावशाली ध्वनि।
  • खुले स्थानों में प्रस्तुति के लिए उपयुक्त।
  • कर्नाटक संगीत का प्रमुख वायु वाद्य।
  • मंदिर संगीत का अभिन्न अंग।

प्रमुख नादस्वरम् वादक

(1) टी. एन. राजरत्नम पिल्लै (T. N. Rajarathinam Pillai) — परिचय: उन्हें "नादस्वरम् चक्रवर्ती" (सम्राट) कहा जाता है। योगदान: नादस्वरम् को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई; कर्नाटक संगीत में नई प्रस्तुति शैली विकसित की।

(2) शेख चिन्ना मौलाना — विशेषता: महान नादस्वरम् वादक; हिन्दू एवं मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय के प्रतीक; कर्नाटक संगीत के प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान।

(3) करुक्कुरिची अरुणाचलम — आधुनिक युग के प्रसिद्ध नादस्वरम् कलाकार।

✔ परीक्षा तथ्य: कर्नाटक संगीत का प्रमुख वायु वाद्य — नादस्वरम्। मंदिरों में बजाया जाने वाला प्रमुख वाद्य। नादस्वरम् चक्रवर्ती — टी. एन. राजरत्नम पिल्लै। तविल के साथ संयुक्त वादन।

4. हारमोनियम (Harmonium)

परिचय

हारमोनियम भारत का अत्यंत लोकप्रिय की-बोर्ड आधारित सुषिर वाद्य है। यद्यपि इसका आविष्कार यूरोप में हुआ था, परन्तु भारतीय संगीतकारों ने इसे भारतीय संगीत के अनुरूप विकसित कर लिया। आज यह शास्त्रीय, अर्धशास्त्रीय, भक्ति, लोक एवं फिल्म संगीत में व्यापक रूप से प्रयुक्त होता है।

इतिहास

हारमोनियम का आविष्कार 19वीं शताब्दी में फ्रांस के अलेक्जेंडर डेबेन (Alexandre Debain) ने किया। बाद में यह भारत पहुँचा, जहाँ इसमें कई परिवर्तन किए गए। भारतीय संगीतज्ञों ने—

  • पैरों से चलने वाली प्रणाली के स्थान पर हाथ से चलने वाली धौंकनी (Bellows) विकसित की।
  • इसे बैठकर बजाने योग्य बनाया।
  • भारतीय राग प्रणाली के अनुरूप स्वर व्यवस्था विकसित की।

संरचना

मुख्य भाग:

  • की-बोर्ड (Keyboard)
  • धौंकनी (Bellows)
  • रीड (Reeds)
  • स्टॉप (Stops)
  • लकड़ी का ढाँचा

वैज्ञानिक सिद्धांत

जब धौंकनी द्वारा वायु रीड तक पहुँचती है, तो धातु की रीड कंपन करती है और ध्वनि उत्पन्न होती है।

विशेषताएँ

  • सरल वादन।
  • गायकों के लिए सर्वोत्तम संगत वाद्य।
  • स्वर सीखने के लिए उपयोगी।
  • भजन, ग़ज़ल एवं लोक संगीत में अत्यधिक लोकप्रिय।

हारमोनियम विवाद

20वीं शताब्दी में कुछ समय के लिए आकाशवाणी (All India Radio) ने हारमोनियम के प्रसारण पर प्रतिबंध लगाया था क्योंकि इसमें मींड तथा सूक्ष्म श्रुतियों की प्रस्तुति सीमित मानी जाती थी। बाद में यह प्रतिबंध हटा लिया गया और आज हारमोनियम पुनः व्यापक रूप से स्वीकार्य है।

प्रमुख हारमोनियम वादक

  • पंडित अप्पा जलगांवकर
  • पंडित तुलसीदास बोरकर
  • पंडित पुरुषोत्तम वालावलकर
✔ परीक्षा तथ्य: हारमोनियम का आविष्कार — फ्रांस। आविष्कारक — अलेक्जेंडर डेबेन। भारतीय संगीत में हाथ से चलने वाली धौंकनी का प्रयोग। फ्री-रीड (Free Reed) आधारित वाद्य।

5. शंख (Conch)

परिचय

शंख भारत का सबसे प्राचीन प्राकृतिक सुषिर वाद्य है। इसका धार्मिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक महत्व अत्यंत अधिक है। वैदिक काल से ही इसका उपयोग युद्ध, पूजा एवं धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता रहा है।

इतिहास

ऋग्वेद, महाभारत, रामायण एवं पुराणों में शंख का विस्तृत वर्णन मिलता है। महाभारत में प्रत्येक प्रमुख योद्धा का अपना विशिष्ट शंख था।

महाभारत के प्रसिद्ध शंख

योद्धा शंख का नाम
श्रीकृष्ण पंचजन्य
अर्जुन देवदत्त
भीम पौण्ड्र
युधिष्ठिर अनन्तविजय
नकुल सुघोष
सहदेव मणिपुष्पक
भाग–5 : अवनद्ध वाद्य (Percussion Instruments / ताल वाद्य)

अवनद्ध वाद्य (Membranophones)

परिचय

अवनद्ध वाद्य वे वाद्ययंत्र हैं जिनमें किसी खोखले पात्र (लकड़ी, धातु या मिट्टी) के मुख पर चमड़ा (झिल्ली) मढ़ा जाता है और उसी झिल्ली के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है।

"अवनद्ध" शब्द संस्कृत के "अव" (ऊपर) तथा "नद्ध" (बँधा हुआ) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है—चमड़े से बँधा हुआ वाद्य।

भारतीय संगीत में ताल (Rhythm) का आधार इन्हीं वाद्यों पर टिका हुआ है। यदि राग संगीत की आत्मा है, तो ताल उसकी गति और जीवन है।

भारतीय संगीत में ताल का महत्व

भारतीय संगीत के तीन आधार हैं—

  • स्वर (Melody)
  • ताल (Rhythm)
  • लय (Tempo)

ताल के बिना संगीत अधूरा माना जाता है। गायक, वादक और नर्तक—सभी ताल पर आधारित प्रस्तुति देते हैं।

अवनद्ध वाद्यों की प्रमुख विशेषताएँ

  • चमड़े की झिल्ली से ध्वनि उत्पन्न होती है।
  • हाथ, उँगलियों या लकड़ी की छड़ियों से बजाए जाते हैं।
  • लय एवं ताल बनाए रखते हैं।
  • शास्त्रीय, लोक, धार्मिक तथा सैन्य संगीत में समान रूप से उपयोगी।
  • विभिन्न क्षेत्रों में इनकी संरचना एवं वादन शैली अलग-अलग होती है।

भारतीय अवनद्ध वाद्यों के प्रमुख प्रकार

वाद्य प्रमुख क्षेत्र
तबला उत्तर भारत
पखावज उत्तर भारत (ध्रुपद)
मृदंगम दक्षिण भारत
ढोलक सम्पूर्ण भारत
ढोल लोक संगीत
नगाड़ा धार्मिक एवं युद्ध संगीत
तविल दक्षिण भारत
कंजीरा कर्नाटक संगीत
डफ लोक एवं सूफी संगीत
चेंडा केरल

1. तबला (Tabla)

परिचय

तबला हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का सबसे लोकप्रिय एवं सर्वाधिक प्रयोग किया जाने वाला ताल वाद्य है। वर्तमान समय में यह भारत ही नहीं बल्कि विश्वभर में भारतीय संगीत का प्रमुख प्रतीक बन चुका है।

तबले का उपयोग— ख्याल, ठुमरी, टप्पा, ग़ज़ल, भजन, कथक, लोक संगीत, फिल्म संगीत तथा फ्यूजन संगीत सभी में किया जाता है।

तबले का इतिहास

तबले की उत्पत्ति के विषय में विद्वानों के अनेक मत हैं।

मत–1 (लोकप्रिय परंपरा): अमीर खुसरो ने तबले का आविष्कार किया।

मत–2 (आधुनिक मत): अधिकांश आधुनिक संगीत इतिहासकार मानते हैं कि—

  • तबले का विकास पखावज से हुआ।
  • इसका वर्तमान स्वरूप 17वीं–18वीं शताब्दी में विकसित हुआ।
  • किसी एक व्यक्ति को इसका आविष्कारक नहीं माना जा सकता।
✔ परीक्षा तथ्य: UPSC/RPSC में आधुनिक मत अधिक स्वीकार्य माना जाता है।

तबले की संरचना

तबला वास्तव में दो अलग-अलग वाद्यों का युग्म है।

(1) दायाँ भाग — इसे तबला / दायाँ / दयान कहा जाता है। विशेषताएँ: लकड़ी से निर्मित; तीव्र स्वर देता है; मुख्य धुन के अनुसार मिलाया जाता है।

(2) बायाँ भाग — इसे बायाँ / डग्गा / बयाँ कहा जाता है। विशेषताएँ: ताँबा, पीतल या मिट्टी से निर्मित; गंभीर (Bass) ध्वनि देता है।

तबले के प्रमुख भाग

  • पुड़ी (चमड़ा)
  • स्याही (काला भाग)
  • किनार
  • मैदान
  • गजरा
  • बंधन
  • लकड़ी के गट्टे

स्याही (Syahi)

तबले का सबसे महत्वपूर्ण भाग स्याही है। यह लोहे की बुरादे, चावल के लेप एवं अन्य पारंपरिक पदार्थों के मिश्रण से तैयार की जाती है। यही तबले को विशिष्ट अनुनाद (Resonance) और स्पष्ट स्वर प्रदान करती है।

तबले की ध्वनियाँ (Bol)

तबले में प्रत्येक प्रहार का अपना नाम होता है। कुछ प्रमुख बोल—

  • धा
  • धिन
  • ना
  • ता
  • तिन
  • गे
  • के
  • ते
  • तिरकिट

इन्हीं बोलों से विभिन्न तालों की रचना होती है।

प्रमुख ताल

ताल मात्राएँ
तीनताल 16
झपताल 10
एकताल 12
रूपक 7
दादरा 6
कहरवा 8
दीपचंदी 14

तबले के प्रमुख घराने

भारतीय तबला वादन में घरानों की परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक घराने की अपनी विशिष्ट शैली, बोल, लयकारी एवं प्रस्तुति होती है।

(1) दिल्ली घराना — सबसे प्राचीन तबला घराना माना जाता है। विशेषताएँ: स्पष्ट बोल, संतुलित वादन, पारंपरिक शैली।

(2) अजराड़ा घराना — मेरठ के अजराड़ा गाँव से विकसित। विशेषताएँ: जटिल लयकारी, कठिन बोल, गणितीय संरचना।

(3) लखनऊ घराना — विशेषताएँ: नृत्य संगत, कथक के लिए उपयुक्त, कोमल एवं सौंदर्यपूर्ण शैली।

(4) फर्रुखाबाद घराना — विशेषताएँ: मधुरता, विविध बोल, एकल वादन में प्रसिद्ध।

(5) बनारस घराना — विशेषताएँ: दमदार वादन, शक्तिशाली बोल, एकल प्रस्तुति में अत्यंत लोकप्रिय।

(6) पंजाब घराना — विशेषताएँ: पखावज शैली का प्रभाव, खुला एवं प्रभावशाली वादन।

विश्व प्रसिद्ध तबला वादक

उस्ताद अल्ला रक्खा (1919–2000) — परिचय: 20वीं शताब्दी के महान तबला वादक। प्रमुख योगदान: पंडित रवि शंकर के साथ विश्वभर में भारतीय संगीत का प्रचार; तबले को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठा। सम्मान: पद्मश्री।

उस्ताद जाकिर हुसैन (1951–2024) — परिचय: विश्व के सर्वश्रेष्ठ तबला वादकों में अग्रणी। वे उस्ताद अल्ला रक्खा के पुत्र थे और भारतीय ताल परंपरा को वैश्विक स्तर पर पहुँचाने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

प्रारम्भिक जीवन: जन्म: 9 मार्च 1951, मुंबई; पिता: उस्ताद अल्ला रक्खा; पंजाब घराना; बचपन से ही कठोर संगीत प्रशिक्षण प्राप्त किया।

वादन शैली: अद्भुत लयबोध; तीव्र गति; स्पष्ट बोल; विभिन्न संगीत परंपराओं के साथ सफल फ्यूजन। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ जैज़, पश्चिमी शास्त्रीय संगीत तथा विश्व संगीत में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रमुख उपलब्धियाँ:

  • पद्मश्री
  • पद्मभूषण
  • पद्मविभूषण
  • अनेक Grammy Awards
  • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार

अंतरराष्ट्रीय योगदान: "Shakti" समूह के सदस्य; John McLaughlin सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ प्रस्तुति; भारतीय ताल को वैश्विक पहचान दिलाई।

पंडित किशन महाराज — घराना: बनारस घराना। विशेषता: एकल तबला वादन, कथक संगत, जटिल लयकारी। सम्मान: पद्मश्री।

पंडित सामता प्रसाद — लोकप्रिय नाम: "गुदई महाराज"। घराना: बनारस घराना। विशेषता: शक्तिशाली बोल, विलक्षण लय नियंत्रण, एकल वादन।

पंडित अनोखेलाल मिश्र — बनारस घराने के महान तबला वादक।

पंडित स्वपन चौधरी — आधुनिक भारत के प्रसिद्ध तबला वादक।

📌 प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
  • तबले का विकास पखावज से माना जाता है।
  • दो भाग—दायाँ एवं बायाँ।
  • तबले का सबसे महत्वपूर्ण भाग—स्याही।
  • सबसे अधिक प्रयुक्त ताल—तीनताल (16 मात्रा)।
  • विश्व प्रसिद्ध तबला वादक—उस्ताद जाकिर हुसैन, उस्ताद अल्ला रक्खा।
  • बनारस घराना—किशन महाराज, सामता प्रसाद।

2. पखावज (Pakhawaj)

परिचय

पखावज उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत का अत्यंत प्राचीन एवं प्रतिष्ठित अवनद्ध (ताल) वाद्य है। इसे तबले का पूर्वज (Predecessor of Tabla) माना जाता है। ध्रुपद एवं धमार जैसी प्राचीन गायन शैलियों में पखावज का विशेष महत्व है।

इसकी ध्वनि गंभीर, गूंजदार एवं प्रभावशाली होती है। मंदिर संगीत तथा पारंपरिक नृत्य प्रस्तुतियों में भी इसका व्यापक उपयोग होता है।

नाम की उत्पत्ति

"पखावज" शब्द की उत्पत्ति के संबंध में अनेक मत हैं। सामान्यतः इसे संस्कृत के "पक्षवाद्य" या "पक्षवाज" से विकसित माना जाता है, जिसका अर्थ है दोनों ओर मुख वाला वाद्य।

इतिहास

  • पखावज का उल्लेख मध्यकालीन संगीत ग्रंथों में मिलता है।
  • इसे प्राचीन मृदंग का विकसित रूप माना जाता है।
  • ध्रुपद परंपरा में यह मुख्य ताल वाद्य रहा।
  • 17वीं–18वीं शताब्दी के बाद ख्याल गायन के विकास के साथ तबला अधिक लोकप्रिय हुआ, किंतु ध्रुपद में आज भी पखावज का प्रमुख स्थान है।

संरचना

  • बेलनाकार (Barrel-shaped) लकड़ी का खोखला शरीर।
  • दोनों सिरों पर चमड़े की झिल्ली।
  • दाएँ और बाएँ भाग की ध्वनि अलग-अलग।
  • चमड़े की पट्टियों द्वारा कसाव।
  • स्वर समायोजन के लिए लकड़ी के गट्टे।

वादन शैली

पखावज को भूमि पर क्षैतिज रखकर दोनों हाथों से बजाया जाता है। इसकी बोल प्रणाली तबले से भिन्न होती है।

प्रमुख बोल: धा, धिन, ता, किट, गा, ते, न।

उपयोग

  • ध्रुपद
  • धमार
  • भजन
  • कथक (विशेषतः पारंपरिक शैली)
  • मंदिर संगीत

प्रमुख पखावज वादक

पंडित पुरुषोत्तम दास — आधुनिक काल के महान पखावज वादक; ध्रुपद परंपरा के प्रमुख प्रतिनिधि।

पंडित मोहन श्याम शर्मा — प्रसिद्ध पखावज वादक; अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुति।

पंडित दलचंद शर्मा — समकालीन भारत के प्रमुख पखावज कलाकार; ध्रुपद एवं एकल वादन दोनों में प्रसिद्ध।

पंडित भीष्मदेव वेदी — पखावज परंपरा के महत्वपूर्ण कलाकार।

✔ परीक्षा तथ्य: पखावज ध्रुपद शैली का प्रमुख ताल वाद्य है। इसे तबले का पूर्वज माना जाता है। इसकी ध्वनि गंभीर एवं गूंजदार होती है। प्रमुख वादक—पुरुषोत्तम दास, मोहन श्याम शर्मा, दलचंद शर्मा।

3. मृदंगम (Mridangam)

परिचय

मृदंगम कर्नाटक शास्त्रीय संगीत का सर्वाधिक महत्वपूर्ण ताल वाद्य है। दक्षिण भारत में इसकी भूमिका वही है जो उत्तर भारत में तबले की है। यह कर्नाटक संगीत की प्रत्येक शास्त्रीय प्रस्तुति का प्रमुख संगत वाद्य है।

नाम की उत्पत्ति

संस्कृत के दो शब्दों से— मृद् = मिट्टी, अंग = शरीर। अर्थात् "मिट्टी का शरीर"। प्राचीन काल में मृदंगम मिट्टी से बनाया जाता था, जबकि आधुनिक मृदंगम प्रायः जैकवुड (कटहल की लकड़ी) से निर्मित होता है।

इतिहास

  • वैदिक एवं उत्तरवैदिक साहित्य में मृदंग का उल्लेख मिलता है।
  • भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में इसका वर्णन है।
  • दक्षिण भारत में कर्नाटक संगीत के विकास के साथ इसका स्वरूप विकसित हुआ।

संरचना

  • बेलनाकार लकड़ी का शरीर।
  • दोनों ओर चमड़े की झिल्लियाँ।
  • दाएँ भाग पर विशेष काला लेप।
  • चमड़े की पट्टियों द्वारा कसाव।

विशेषताएँ

  • अत्यंत संतुलित एवं स्पष्ट ध्वनि।
  • जटिल लयकारी के लिए उपयुक्त।
  • एकल एवं संगत दोनों रूपों में प्रयोग।

प्रमुख मृदंगम वादक

पलघाट मणि अय्यर — कर्नाटक संगीत के महान मृदंगम वादक; आधुनिक मृदंगम वादन शैली के प्रमुख निर्माता।

उमयालपुरम के. शिवरामन — पद्म विभूषण से सम्मानित; "मृदंगम के सम्राट" के रूप में प्रसिद्ध।

टी. के. मूर्ति — प्रसिद्ध कर्नाटक ताल वादक; अनेक महान गायकों के साथ संगत।

पलनी सुब्रमणिया पिल्लै — लय एवं नाद के उत्कृष्ट संयोजन के लिए प्रसिद्ध।

✔ परीक्षा तथ्य: कर्नाटक संगीत का प्रमुख ताल वाद्य—मृदंगम। प्रमुख वादक—पलघाट मणि अय्यर, उमयालपुरम शिवरामन। प्राचीन उल्लेख—नाट्यशास्त्र।

4. ढोलक (Dholak)

परिचय

ढोलक भारत का सर्वाधिक लोकप्रिय लोक ताल वाद्य है। यह ग्रामीण एवं शहरी दोनों क्षेत्रों में समान रूप से प्रचलित है। लोकगीत, भजन, कीर्तन, विवाह, धार्मिक आयोजन तथा फिल्म संगीत में इसका व्यापक उपयोग होता है।

संरचना

  • लकड़ी का खोखला शरीर।
  • दोनों ओर चमड़े की झिल्ली।
  • एक ओर तीव्र तथा दूसरी ओर गंभीर स्वर।
  • रस्सी या धातु के बोल्ट द्वारा कसाव।

उपयोग

  • लोकगीत
  • भजन
  • कीर्तन
  • सूफी संगीत
  • कव्वाली
  • फिल्म संगीत
  • विवाह समारोह

प्रमुख विशेषताएँ

  • सरल वादन।
  • मधुर एवं लोकधर्मी ध्वनि।
  • उत्तर भारत, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, बिहार, उत्तर प्रदेश तथा मध्य भारत में अत्यधिक लोकप्रिय।

5. ढोल (Dhol)

परिचय

ढोल भारतीय लोक संस्कृति का अत्यंत महत्वपूर्ण वाद्य है। लगभग प्रत्येक राज्य में इसका कोई न कोई क्षेत्रीय रूप मिलता है।

प्रमुख क्षेत्रीय रूप

  • पंजाब – भांगड़ा ढोल
  • राजस्थान – ढोल
  • गुजरात – गरबा ढोल
  • उत्तराखंड – ढोल-दमाऊँ
  • हिमाचल – ढोल
  • महाराष्ट्र – ढोल-ताशा

उपयोग

  • लोक नृत्य
  • धार्मिक यात्रा
  • विवाह
  • विजय उत्सव
  • लोक नाट्य

6. नगाड़ा (Nagara)

परिचय

नगाड़ा एक बड़ा अर्धगोलाकार ताल वाद्य है। इसका प्रयोग प्राचीन काल में युद्ध घोष, राजकीय घोषणाओं तथा मंदिरों में किया जाता था।

संरचना

  • धातु का अर्धगोलाकार पात्र।
  • ऊपर चमड़े की झिल्ली।
  • लकड़ी की छड़ियों से बजाया जाता है।

उपयोग

  • मंदिर
  • दुर्ग
  • राजदरबार
  • लोक उत्सव
  • दशहरा एवं धार्मिक आयोजन

7. डफ (Duff / Daf)

परिचय

डफ एक गोलाकार फ्रेम ड्रम है। यह सूफी संगीत, कव्वाली, लोक संगीत तथा धार्मिक आयोजनों में व्यापक रूप से प्रयुक्त होता है।

संरचना

  • गोल लकड़ी का फ्रेम।
  • एक ओर चमड़े की झिल्ली।
  • कुछ प्रकारों में धातु की झंकारियाँ (Jingles) लगी होती हैं।

उपयोग

  • कव्वाली
  • सूफी संगीत
  • लोक नृत्य
  • होली एवं अन्य लोक उत्सव

8. तविल (Tavil)

परिचय

तविल दक्षिण भारत का प्रमुख ताल वाद्य है। इसे विशेष रूप से नादस्वरम् की संगत में बजाया जाता है। तमिलनाडु के मंदिरों एवं धार्मिक आयोजनों में इसका अत्यधिक महत्व है।

संरचना

  • लकड़ी का बेलनाकार शरीर।
  • दोनों ओर चमड़े की झिल्ली।
  • एक ओर उँगलियों से, दूसरी ओर विशेष छड़ी से वादन।

विशेषताएँ

  • तीव्र एवं ऊर्जावान ध्वनि।
  • नादस्वरम् के साथ आदर्श संगत।

9. कंजीरा (Kanjira)

परिचय

कंजीरा कर्नाटक संगीत का एक छोटा फ्रेम ड्रम है। इसे दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत में संगत वाद्य के रूप में उपयोग किया जाता है।

संरचना

  • गोल लकड़ी का फ्रेम।
  • एक ओर झिल्ली।
  • एक या दो धातु की झंकारियाँ।

प्रमुख वादक

जी. हरि शंकर — विश्व के महान कंजीरा वादकों में गिने जाते हैं।

सेल्वगणेश विनायकम — आधुनिक कर्नाटक ताल वादन के प्रमुख कलाकार।

उत्तर भारतीय एवं दक्षिण भारतीय ताल वाद्यों की तुलना

आधार उत्तर भारत दक्षिण भारत
प्रमुख वाद्य तबला मृदंगम
ध्रुपद संगत पखावज
लोक वाद्य ढोलक, ढोल तविल
संगत वाद्य तबला मृदंगम, कंजीरा
मंदिर संगीत नगाड़ा तविल
भाग–6 : घन वाद्य (Idiophones)

घन वाद्य (Idiophones)

परिचय

भारतीय संगीतशास्त्र में घन वाद्य वे वाद्ययंत्र हैं जिनमें किसी तार, झिल्ली (चमड़ा) अथवा वायु स्तम्भ की आवश्यकता नहीं होती। इन वाद्यों में स्वयं वाद्य का ठोस शरीर (Solid Body) कंपन करके ध्वनि उत्पन्न करता है।

संस्कृत में "घन" का अर्थ है ठोस (Solid)। इस कारण इन्हें घन वाद्य कहा जाता है। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में तथा शारंगदेव ने संगीत रत्नाकर में इनका उल्लेख किया है।

ध्वनि उत्पन्न होने का सिद्धांत

जब घन वाद्य पर प्रहार किया जाता है अथवा दो भागों को आपस में टकराया जाता है, तब उसका सम्पूर्ण ठोस शरीर कंपन करता है और ध्वनि उत्पन्न होती है।

उदाहरण— घंटा, मंजीरा, झांझ, करताल, जलतरंग, घटम।

घन वाद्यों की प्रमुख विशेषताएँ

  • इनमें तार या चमड़ा नहीं होता।
  • ध्वनि वाद्य के ठोस शरीर से उत्पन्न होती है।
  • ताल बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका।
  • मंदिर संगीत, भजन, लोक संगीत एवं शास्त्रीय संगीत में उपयोग।
  • सरल संरचना किंतु प्रभावशाली ध्वनि।

घन वाद्यों के प्रमुख प्रकार

वाद्य उपयोग
मंजीरा भजन, कीर्तन
झांझ मंदिर एवं लोक संगीत
करताल भजन, लोक संगीत
घंटा धार्मिक अनुष्ठान
जलतरंग शास्त्रीय संगीत
घटम कर्नाटक संगीत
खड़ताल राजस्थान एवं भक्ति संगीत
घुँघरू नृत्य

1. मंजीरा (Manjira)

परिचय

मंजीरा भारतीय संगीत का अत्यंत प्राचीन एवं लोकप्रिय घन वाद्य है। यह दो छोटी धातु की गोल प्लेटों (Cymbals) का युग्म होता है जिन्हें आपस में टकराकर बजाया जाता है।

संरचना

  • पीतल, काँसा या कांस्य धातु से निर्मित।
  • दो गोल चक्र।
  • डोरी द्वारा जुड़े होते हैं।

उपयोग

  • भजन
  • कीर्तन
  • लोकगीत
  • गरबा
  • धार्मिक अनुष्ठान
  • लोक नृत्य

विशेषताएँ

  • तीव्र एवं स्पष्ट ध्वनि।
  • ताल बनाए रखने के लिए उपयोग।
  • अत्यंत सरल वाद्य।
✔ परीक्षा तथ्य: भजन-कीर्तन का प्रमुख घन वाद्य। दो धातु की प्लेटों से निर्मित।

2. झांझ (Jhanjh)

परिचय

झांझ मंजीरे का बड़ा रूप है। इसे दोनों हाथों में पकड़कर आपस में टकराया जाता है।

संरचना

  • बड़े आकार की धातु की प्लेटें।
  • मध्य में पकड़ने का स्थान।

उपयोग

  • मंदिर
  • आरती
  • दुर्गा पूजा
  • लोक नृत्य
  • सैन्य एवं धार्मिक घोष

विशेषताएँ

  • अत्यंत तेज ध्वनि।
  • बड़े समूहों में प्रयोग।

3. करताल (Kartal)

परिचय

करताल भारतीय भक्ति संगीत का प्रमुख ताल वाद्य है।

प्रकार

लकड़ी की करताल: दो लकड़ी के टुकड़ों में धातु की छोटी झंकारियाँ लगी होती हैं।

धातु करताल: दो धातु के चपटे टुकड़े।

उपयोग

  • भजन
  • कीर्तन
  • संकीर्तन
  • लोक संगीत

प्रमुख क्षेत्र

  • राजस्थान
  • गुजरात
  • उत्तर प्रदेश
  • मध्य प्रदेश
  • बंगाल

4. खड़ताल (Khartal)

परिचय

खड़ताल राजस्थान का अत्यंत प्रसिद्ध लोक वाद्य है। इसे विशेष रूप से मांगणियार एवं लंगा समुदाय के कलाकार बजाते हैं।

संरचना

  • लकड़ी की चार पट्टियाँ।
  • हाथों में पकड़कर बजाई जाती हैं।

उपयोग

  • राजस्थानी लोक संगीत।
  • भजन।
  • लोक नृत्य।
  • मांड गायन।

प्रमुख कलाकार

पद्मश्री सादिक खान — राजस्थान की लोक परंपरा से जुड़े प्रमुख कलाकारों में से एक।

अनवर खान मांगणियार — विश्व प्रसिद्ध लोक कलाकार।

✔ परीक्षा तथ्य: राजस्थान का प्रसिद्ध लोक वाद्य। मांगणियार एवं लंगा समुदाय द्वारा बजाया जाता है।

5. घंटा (Bell)

परिचय

घंटा भारत का सबसे प्राचीन धार्मिक घन वाद्य है।

उपयोग

  • मंदिर
  • पूजा
  • आरती
  • बौद्ध विहार
  • जैन मंदिर

धार्मिक महत्व

घंटा बजाने को शुभ माना जाता है। पूजा प्रारम्भ एवं समाप्ति पर घंटा बजाने की परंपरा है।

वैज्ञानिक पक्ष

घंटे की ध्वनि में दीर्घ अनुनाद (Long Resonance) होता है, जो लंबे समय तक सुनाई देता है।

6. जलतरंग (Jal Tarang)

परिचय

जलतरंग भारतीय संगीत का अत्यंत विशिष्ट घन वाद्य है। इसमें विभिन्न आकार के चीनी मिट्टी या धातु के कटोरों में अलग-अलग मात्रा में जल भरकर स्वर उत्पन्न किए जाते हैं।

संरचना

  • 15–22 कटोरे।
  • प्रत्येक कटोरे में अलग जल मात्रा।
  • दो पतली लकड़ी या बाँस की छड़ियों से वादन।

विशेषता

  • प्रत्येक कटोरा अलग स्वर देता है।
  • अत्यंत मधुर ध्वनि।
  • शास्त्रीय संगीत में प्रयोग।

प्रमुख कलाकार

पंडित मिलिंद तुलणकर — भारत के प्रमुख जलतरंग वादक।

अनयमपट्टी एस. गणेशन — दक्षिण भारत के प्रसिद्ध जलतरंग कलाकार।

✔ परीक्षा तथ्य: जल की मात्रा बदलने से स्वर बदलता है। कटोरों को छड़ियों से बजाया जाता है।

7. घटम (Ghatam)

परिचय

घटम कर्नाटक संगीत का प्रमुख घन वाद्य है। यह साधारण मिट्टी के घड़े जैसा दिखाई देता है, परन्तु इसकी संरचना एवं ध्वनि अत्यंत वैज्ञानिक होती है।

संरचना

  • विशेष प्रकार की मिट्टी।
  • कभी-कभी ताँबा एवं पीतल का मिश्रण।
  • गोलाकार पात्र।

वादन

  • उँगलियों।
  • हथेली।
  • नाखून।
  • कलाई।

विशेषताएँ

  • अत्यंत तीव्र एवं स्पष्ट ध्वनि।
  • कर्नाटक संगीत में संगत।

प्रमुख कलाकार

पद्मभूषण टी. एच. विनायकम (विक्कू विनायकम) — विश्व के महान घटम वादक।

सुकन्या रामगोपाल — प्रसिद्ध महिला घटम वादक।

✔ परीक्षा तथ्य: घटम कर्नाटक संगीत का घन वाद्य है। मिट्टी से निर्मित। प्रमुख कलाकार—विक्कू विनायकम।

8. घुँघरू (Ghungroo)

परिचय

घुँघरू धातु की छोटी घंटियों का समूह है जिसे नर्तक अपने पैरों में बाँधते हैं।

उपयोग

  • कथक
  • भरतनाट्यम
  • ओडिसी
  • कुचिपुड़ी
  • लोक नृत्य

महत्व

  • ताल का बोध।
  • लय की स्पष्टता।
  • नृत्य की सुंदरता।

घन वाद्यों का तुलनात्मक अध्ययन

वाद्य निर्माण सामग्री प्रमुख उपयोग
मंजीरा काँसा/पीतल भजन
झांझ काँसा आरती
करताल लकड़ी/धातु कीर्तन
खड़ताल लकड़ी राजस्थानी लोक संगीत
घंटा काँसा पूजा
जलतरंग चीनी मिट्टी शास्त्रीय संगीत
घटम मिट्टी कर्नाटक संगीत
घुँघरू पीतल नृत्य
📌 प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
  • मंजीरा → भजन-कीर्तन
  • झांझ → आरती
  • करताल → संकीर्तन
  • खड़ताल → राजस्थान
  • घंटा → मंदिर
  • जलतरंग → पानी से स्वर
  • घटम → कर्नाटक संगीत
  • घुँघरू → नृत्य
सम्पूर्ण पुनरावृत्ति (Revision)

सम्पूर्ण भारतीय वाद्ययंत्रों का वर्गीकरण (Revision Table)

वर्ग प्रमुख वाद्य
तत वाद्य सितार, सरोद, वीणा, संतूर, सारंगी, तानपुरा, मोहन वीणा, रुद्र वीणा
सुषिर वाद्य बांसुरी, शहनाई, नादस्वरम्, हारमोनियम, शंख
अवनद्ध वाद्य तबला, पखावज, मृदंगम, ढोलक, ढोल, नगाड़ा, तविल, कंजीरा
घन वाद्य मंजीरा, झांझ, करताल, खड़ताल, जलतरंग, घटम, घंटा, घुँघरू

प्रमुख वाद्ययंत्र एवं वादक (सम्पूर्ण सूची)

क्र. वाद्ययंत्र प्रमुख वादक
1 सितार पं. रवि शंकर
2 सितार उ. विलायत खान
3 सितार पं. निखिल बनर्जी
4 सितार शाहिद परवेज
5 सितार बुद्धादित्य मुखर्जी
6 सितार शुभेन्द्र राव
7 सरोद उ. अमजद अली खान
8 सरोद उ. अली अकबर खान
9 सरोद पं. बुद्धदेव दासगुप्ता
10 सरोद आशिष खान
11 सरोद तेजेन्द्र नारायण मजूमदार
12 वीणा एस. बालचंदर
13 वीणा ई. गायत्री
14 वीणा जयंती कुमारेश
15 वीणा आर. विश्वेश्वरन
16 रुद्र वीणा उ. असद अली खान
17 रुद्र वीणा उ. जिया मोहिउद्दीन डागर
18 विचित्र वीणा पं. गोपाल कृष्ण
19 विचित्र वीणा पं. लालमणि मिश्र
20 चित्र वीणा एन. रविकिरण
21 संतूर पं. शिवकुमार शर्मा
22 संतूर राहुल शर्मा
23 संतूर भजन सोपोरी
24 संतूर अभय रुस्तम सोपोरी
25 सारंगी पं. राम नारायण
26 सारंगी उ. सुल्तान खान
27 सारंगी साबरी खान
28 सारंगी कमाल साबरी
29 सारंगी उस्ताद मोइनुद्दीन खान
30 तानपुरा परंपरागत संगत वाद्य (विशिष्ट एकल वादक प्रसिद्ध नहीं)
31 मोहन वीणा पं. विश्वमोहन भट्ट
32 इसराज रणधीर राय
33 इसराज अशेष बंद्योपाध्याय
34 दिलरुबा भाई अवतार सिंह
35 वायलिन डॉ. एल. सुब्रमण्यम
36 वायलिन एल. शंकर
37 वायलिन एम. एस. गोपालकृष्णन
38 वायलिन कुन्नाकुडी वैद्यनाथन
39 वायलिन टी. एन. कृष्णन
40 वायलिन एन. राजम
41 बांसुरी पं. हरिप्रसाद चौरसिया
42 बांसुरी पं. पन्नालाल घोष
43 बांसुरी रोनू मजूमदार
44 बांसुरी एन. रामानी
45 बांसुरी राकेश चौरसिया
46 शहनाई उ. बिस्मिल्लाह खान
47 शहनाई अली अहमद हुसैन खान
48 शहनाई अनंत लाल
49 नादस्वरम् टी. एन. राजरत्नम पिल्लै
50 नादस्वरम् शेख चिन्ना मौलाना
51 नादस्वरम् करुक्कुरिची अरुणाचलम
52 हारमोनियम पं. अप्पा जलगांवकर
53 हारमोनियम पं. तुलसीदास बोरकर
54 हारमोनियम पं. पुरुषोत्तम वालावलकर
55 शंख धार्मिक परंपरा (विशिष्ट वादक नहीं)
56 तबला उ. जाकिर हुसैन
57 तबला उ. अल्ला रक्खा
58 तबला पं. किशन महाराज
59 तबला पं. सामता प्रसाद
60 तबला पं. अनोखेलाल मिश्र
61 तबला पं. स्वपन चौधरी
62 तबला पं. कुमार बोस
63 तबला पं. सुरेश तळवलकर
64 तबला योगेश समसी
65 पखावज पं. पुरुषोत्तम दास
66 पखावज पं. मोहन श्याम शर्मा
67 पखावज पं. दलचंद शर्मा
68 पखावज पं. भीष्मदेव वेदी
69 मृदंगम पलघाट मणि अय्यर
70 मृदंगम उमयालपुरम के. शिवरामन
71 मृदंगम टी. के. मूर्ति
72 मृदंगम पलनी सुब्रमणिया पिल्लै
73 ढोलक लोक कलाकार (सामूहिक परंपरा)
74 ढोल लोक कलाकार
75 नगाड़ा पारंपरिक मंदिर एवं लोक कलाकार
76 डफ सूफी एवं लोक कलाकार
77 तविल वलयपट्टी ए. आर. सुब्रमणियम
78 तविल हरिद्वारमंगलम ए. के. पलानीवेल
79 कंजीरा जी. हरि शंकर
80 कंजीरा सेल्वगणेश विनायकम
81 घटम टी. एच. "विक्कू" विनायकम
82 घटम सुकन्या रामगोपाल
83 जलतरंग पं. मिलिंद तुलणकर
84 जलतरंग अनयमपट्टी एस. गणेशन
85 मंजीरा पारंपरिक भजन कलाकार
86 झांझ पारंपरिक मंदिर कलाकार
87 करताल भजन एवं कीर्तन परंपरा
88 खड़ताल अनवर खान मांगणियार
89 खड़ताल सादिक खान
90 घंटा धार्मिक परंपरा
91 घुँघरू कथक एवं शास्त्रीय नर्तक
92 गिटार (भारतीय फ्यूजन) ब्रिज भूषण काबरा
93 स्लाइड गिटार पं. विश्वमोहन भट्ट
94 मंडोलिन यू. श्रीनिवास
95 मंडोलिन उप्पलापु राजेश
96 सैक्सोफोन (कर्नाटक) कदरी गोपालनाथ
97 क्लैरिनेट ए. के. सी. नटराजन
98 पियानो (भारतीय शास्त्रीय प्रयोग) अनिल श्रीनिवासन
99 रबाब मोहम्मद हाशमी
100 कमैचा वसीफुद्दीन खान मांगणियार
101 एकतारा लोक एवं संत परंपरा
102 रावणहत्था नाथूराम भाट
103 रावणहत्था श्रीधर भाट
104 पेना (मणिपुर) पारंपरिक मैतेई कलाकार
105 पोंगी/पुंगी (बीन) सपेरा समुदाय के कलाकार

अधिक अध्ययन सामग्री के लिए विजिट करें

🌐 Visit Cosmo Classes